Patna / Prayagraj | Bihar Baithak
Shankaracharya Avimukteshwaranand aaj desh ki rajneeti aur dharmik bahas ke kendr me hain, jahan Supreme Court stay, Prayagraj Mela vivaad aur unke bayaan naye sawal khade kar rahe hain.
देश की राजनीति और धार्मिक विमर्श में इन दिनों एक असामान्य स्थिति देखने को मिल रही है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, जो लंबे समय तक सनातन धर्म के सर्वोच्च संतों में गिने जाते रहे, आज अपने बयानों और आचरण को लेकर केंद्र में आ गए हैं। मामला अब केवल धर्म या आस्था का नहीं रहा, बल्कि इसमें कानून, प्रशासन और राजनीति तीनों आपस में टकराते दिख रहे हैं।
Shankaracharya Avimukteshwaranand par Supreme Court ka Stay: Asli Kanooni Sach

सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद, उनकी वसीयत के आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिर्मठ का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। हालांकि, इस नियुक्ति को अदालत में चुनौती दी गई।
अक्टूबर 2022 में Supreme Court ने उनके पट्टाभिषेक पर रोक (Stay Order) लगा दी। कोर्ट का स्पष्ट कहना था कि जब तक नियुक्ति की वैधानिकता तय नहीं हो जाती, तब तक वे आधिकारिक रूप से “स्थापित शंकराचार्य” के रूप में कार्य नहीं कर सकते।
कानूनी दृष्टि से, यह स्थिति उनके पद को विवादित (Disputed) बनाती है, जिसे प्रशासनिक निर्णयों में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

Prayagraj मेला और प्रशासन की सख्ती
प्रयागराज महाकुंभ मेला प्रशासन ने इसी स्टे ऑर्डर का हवाला देते हुए शंकराचार्य को नोटिस जारी किया। प्रशासन का सवाल सीधा था—
जब Supreme Court ने पद पर रोक लगाई है, तो सरकारी दस्तावेज़ों और मेला सुविधाओं में स्वयं को “शंकराचार्य” क्यों लिखा जा रहा है?
दिलचस्प बात यह है कि मेला शुरू होने पर प्रशासन ने उन्हें वीआईपी सुविधाएं और ज़मीन उपलब्ध कराई थी। लेकिन जैसे ही 50 मीटर पैदल चलने को लेकर विवाद बढ़ा और धरना शुरू हुआ, प्रशासन ने कानूनी स्थिति का हवाला दे दिया।
राजनीति का नया ‘पैटर्न’ और समर्थन की दिशा

यहां से मामला एक नए मोड़ पर पहुंचता है। जो शंकराचार्य लंबे समय तक हिंदू समाज के सबसे बड़े धार्मिक गुरु माने जाते थे, आज उनके बयान उन समूहों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ज़्यादा दिख रहे हैं, जो आमतौर पर सनातन धर्म या मौजूदा सरकार के विरोध में रहते हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, यह “दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है” वाली राजनीति का उदाहरण है। विपक्ष और सरकार-विरोधी समूहों को लगता है कि जब एक बड़ा हिंदू धर्मगुरु सरकार पर सवाल उठाता है, तो इससे सत्ता की धार्मिक छवि को चुनौती मिलती है।
Bihar Baithak का विश्लेषण

यह स्थिति एक गहरी विडंबना को उजागर करती है। जिन शंकराचार्य से सनातन की रक्षा की उम्मीद की जाती है, आज उनके बयान ऐसे मंचों पर सराहे जा रहे हैं जो परंपरागत रूप से सनातन के आलोचक रहे हैं।
कानून के मुताबिक, जब पद स्वयं अदालत में विचाराधीन है, तब उसी पद की मर्यादा के आधार पर विशेष अधिकार मांगना प्रशासन के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। वहीं, धर्मगुरु के रूप में अत्यधिक टकराव उनकी सामाजिक विश्वसनीयता पर भी असर डाल सकता है।
निष्कर्ष: आस्था या राजनीति?
एक शंकराचार्य का पद राजा (सरकार) को सही राह दिखाने के लिए होता है, न कि किसी एक राजनीतिक विचारधारा का एजेंट बनने के लिए। जब एक संत की वाणी से ‘गैरों’ को खुशी होने लगे और ‘अपनों’ के मन में संदेह पैदा हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं मर्यादा का उल्लंघन हुआ है। 50 मीटर की जिद ने आज उन्हें उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहां लोग उनके त्याग पर नहीं, बल्कि उनके ‘एजेंडे’ पर सवाल उठा रहे हैं।
एडिटोरियल नोट:
संपादकीय टिप्पणी: बिहार बैठक का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि सच को आइना दिखाना है। अविमुक्तेश्वरानंद जी का विरोध तब तक “निष्पक्ष” नहीं कहा जा सकता, जब तक वह विपक्षी नेताओं के हिंदू विरोधी बयानों पर भी उतनी ही कड़ाई से नहीं गरजते। एकतरफा नाराजगी अक्सर ‘व्यक्तिगत’ या ‘राजनीतिक’ होती है। प्रशासन को संतों की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए, लेकिन संतों को भी यह याद रखना चाहिए कि ‘लोक-कल्याण’ ही सबसे बड़ा धर्म है।

