दरभंगा राज का इतिहास केवल राजमहलों और संपन्नता की कहानी नहीं है।
दरअसल, यह इतिहास राष्ट्र के प्रति त्याग, जिम्मेदारी और दूरदर्शिता का भी प्रतीक रहा है।
इसी क्रम में, 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान दरभंगा राज द्वारा दिया गया 600 किलो सोने का दान भारतीय इतिहास के सबसे बड़े निजी योगदानों में गिना जाता है।
हालांकि, समय के साथ यह कहानी सार्वजनिक स्मृति से लगभग ओझल हो गई।
1962 का भारत-चीन युद्ध और देश की आर्थिक चुनौती
1962 में जब भारत-चीन युद्ध छिड़ा, तब देश गंभीर आर्थिक और सैन्य संकट से गुजर रहा था।
उस समय, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र की रक्षा के लिए जनता से सहयोग की अपील की थी।
इसी अपील के जवाब में, कई लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया।
लेकिन, दरभंगा राज द्वारा लिया गया निर्णय असाधारण था।
600 किलो सोना: एक अभूतपूर्व दान
दरभंगा राज के महाराज कामेश्वर सिंह के परिवार ने सीधे National Defence Fund में लगभग 600 किलो सोना दान कर दिया।
दरअसल, यह उस दौर में किसी एक परिवार द्वारा किया गया सबसे बड़ा निजी दान माना जाता है।
सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि इस दान के कुछ ही समय बाद महाराज कामेश्वर सिंह का निधन हो गया।
इसके बावजूद, परिवार ने राष्ट्रहित को कभी पीछे नहीं रखा।
दरभंगा एयरपोर्ट की जड़ें दरभंगा राज से जुड़ी हैं
आज जिस दरभंगा एयरपोर्ट को हम देखते हैं, उसका इतिहास भी इसी त्याग से जुड़ा है।
उस दौर में, यह हवाई पट्टी दरभंगा राज की निजी संपत्ति थी।
युद्ध के समय:
- लगभग 90 एकड़ की एयरस्ट्रिप सरकार को सौंपी गई
- तीन निजी विमान भारतीय वायुसेना के उपयोग में दिए गए
इसी कारण, दरभंगा रणनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सका।
शिक्षा, संस्कृति और समाज के संरक्षक
दरभंगा राज केवल युद्धकाल में ही नहीं, बल्कि शांति काल में भी राष्ट्र निर्माण का हिस्सा रहा।
विशेष रूप से, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय है।
- बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के निर्माण में आर्थिक सहयोग
- कलकत्ता विश्वविद्यालय को सहायता
- मिथिला संस्कृति, संस्कृत भाषा और शास्त्रीय संगीत का संरक्षण
इस प्रकार, दरभंगा राज ने संपत्ति को निजी ऐश्वर्य नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व माना।
महारानी कामुंदरी देवी: सादगी और सेवा का जीवन
दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामुंदरी देवी महाराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं।
व्यक्तिगत जीवन में, वे अत्यंत सादगीपूर्ण और धार्मिक स्वभाव की थीं।
महाराज के निधन के बाद:
- उन्होंने राजकीय विरासत को संभाला
- कई ट्रस्टों के माध्यम से समाज सेवा जारी रखी
- शिक्षा और धार्मिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई
हाल ही में, 90 वर्ष से अधिक की आयु में उनके निधन के साथ एक ऐतिहासिक युग का अंत हो गया।
महारानी कामुंदरी देवी: सादगी और सेवा का जीवन
दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामुंदरी देवी महाराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं।
व्यक्तिगत जीवन में, वे अत्यंत सादगीपूर्ण और धार्मिक स्वभाव की थीं।
महाराज के निधन के बाद:
- उन्होंने राजकीय विरासत को संभाला
- कई ट्रस्टों के माध्यम से समाज सेवा जारी रखी
- शिक्षा और धार्मिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई
हाल ही में, 90 वर्ष से अधिक की आयु में उनके निधन के साथ एक ऐतिहासिक युग का अंत हो गया।
अंततः, दरभंगा राज का योगदान केवल 600 किलो सोने तक सीमित नहीं था।
बल्कि, यह एक सोच थी — जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि था।
महारानी कामुंदरी देवी के निधन के साथ एक अध्याय समाप्त जरूर हुआ है,
लेकिन, दरभंगा राज की यह विरासत भारतीय इतिहास में हमेशा जीवित रहेगी।

