
गया शहर में रोज़ की तरह सैकड़ों लोग चाय पीते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यहां एक ऐसे चायवाले भी हैं, जिनकी चाय सिर्फ स्वाद नहीं, राहत और इंसानियत भी बांटती है।
हम बात कर रहे हैं गया के Sanjay Kumar की—जिन्हें आज लोग एक चायवाले से ज़्यादा, सेवा भाव से भरे इंसान के रूप में जानते हैं। चाय बेचकर सेवा करने का संकल्प संजय कुमार कोई बड़े उद्योगपति नहीं हैं। न कोई सरकारी मदद, न कोई बड़ा मंच,
बस एक छोटी सी चाय की दुकान—और बड़ा दिल। वे जो भी कमाते हैं, उसका एक हिस्सा गरीबों, असहायों और जरूरतमंदों की मदद में लगाते हैं। यही वजह है कि उनकी चाय की दुकान आज मानवता की पहचान बन चुकी है। मुफ्त चाय से लेकर भोजन तक
संजय कुमार की सेवा सिर्फ एक चीज़ तक सीमित नहीं है। वे अपनी कमाई से: गरीब और लाचार लोगों को मुफ्त चाय, बिस्कुट और शरबत पिलाते हैं सर्दियों में कंबल बांटते हैं जरूरतमंद परिवारों को आटा, चावल, तेल जैसे राशन सामग्री देते हैं कई बार गरीबों को दिन में तीन समय का भोजन भी उपलब्ध कराते हैं यह सब किसी NGO या सरकारी योजना से नहीं, बल्कि खुद की मेहनत की कमाई से होता है। खुद कमजोर, फिर भी दूसरों के लिए मजबूत सबसे बड़ी बात यह है कि संजय कुमार खुद किसी बड़े आर्थिक साधन से संपन्न नहीं हैं। इसके बावजूद वे मानते हैं कि— “अगर मेरे पास चाय बेचकर कुछ भी बचता है, तो वो किसी भूखे पेट तक पहुँचना चाहिए।”
यही सोच उन्हें आम चायवाले से अलग बनाती है। गया के ‘लोकल हीरो’ आज संजय कुमार गया के कई इलाकों में लोकल हीरो बन चुके हैं। गर्मियों में जब लोग शरबत के लिए तरसते हैं, सर्दियों में जब कंबल की जरूरत होती है— उनकी चाय की दुकान एक भरोसे का ठिकाना बन जाती है। लोग कहते हैं कि जरूरत पड़ने पर संजय कुमार किसी फरिश्ते से कम नहीं। बिना प्रचार, बिना दिखावे
न सोशल मीडिया का शोर, न बड़े पोस्टर, न कोई विज्ञापन। उनकी पहचान सिर्फ उनके काम से बनी है।
यही वजह है कि उनकी दरियादिली की चर्चा आज पूरे गया में होती है। बिहार बाइठक की टिप्पणी Bihar Baithak का मानना है कि
संजय कुमार जैसे लोग बिहार की असली तस्वीर हैं— जहां सीमित साधनों में भी असीम इंसानियत ज़िंदा है। ऐसी कहानियां बताती हैं कि बदलाव हमेशा सत्ता या सिस्टम से नहीं, कभी-कभी एक चाय की दुकान से भी शुरू हो सकता है।
