लेखक: Vivek Kumar | Bihar Baithak (Editorial)
1962 की चेतावनी आज भी भारत की राजनीति और समाज को आईना दिखाती है, जिसे डॉ. राममनोहर लोहिया ने दशकों पहले समझा दिया था।
भारत का लोकतंत्र आज जिन सवालों से जूझ रहा है, उनमें से कई सवाल नए नहीं हैं।
वे सवाल दशकों पहले उठाए जा चुके थे — फर्क सिर्फ इतना है कि तब चेतावनी दी गई थी, और आज हम परिणाम देख रहे हैं।
1962 में गोरखपुर में आयोजित समाजवादियों के एक शिविर में डॉ. राममनोहर लोहिया ने जाति, सत्ता, राजनीति और सामाजिक न्याय को लेकर जो बातें कहीं थीं, वे आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
पूर्व सांसद हुकुमदेव नारायण यादव द्वारा साझा किया गया यह ऐतिहासिक दस्तावेज हमें आईना दिखाता है — एक ऐसा आईना, जिसमें आज का भारत साफ दिखाई देता है।
लोहिया की सबसे बड़ी चिंता: “जाति का अंत नहीं, चेतना का अंत”
डॉ. लोहिया ने अपने व्याख्यान में साफ कहा था कि
“जाति केवल सामाजिक ढांचा नहीं है, यह सत्ता का औजार बन चुकी है।”
उनका मानना था कि यदि जाति-आधारित असमानता को केवल भाषणों से खत्म करने की कोशिश की गई, तो वह और मजबूत होगी।
उन्होंने चेताया था कि—
- ऊँची जातियाँ सत्ता, शिक्षा और नौकरियों पर कब्ज़ा बनाए रखेंगी
- पिछड़े और वंचित वर्ग केवल भीड़ बने रहेंगे
- राजनीति जाति को तोड़ेगी नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करेगी
आज जब हम चुनावी भाषण, टिकट वितरण और सत्ता संरचना देखते हैं, तो लोहिया की यह आशंका सच होती दिखती है।
“आक्रोश नहीं, संगठन चाहिए” — लोहिया का स्पष्ट संदेश
लोहिया ने साफ कहा था कि केवल गुस्सा और नारे समाज नहीं बदलते।
उन्होंने लिखा—
“जलन पैदा करने से क्रांति नहीं आती, क्रांति संगठन से आती है।”
वे मानते थे कि जातीय आक्रोश यदि दिशा विहीन हो गया, तो वह समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ देगा।
आज सोशल मीडिया और राजनीति में जिस तरह नफरत, अपमान और उकसावे की भाषा बढ़ी है, वह इसी चेतावनी को दोहराती है।
शिक्षा, सोच और सत्ता: तीनों पर सवाल
डॉ. लोहिया ने केवल राजनीति पर नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाया।
उन्होंने कहा था कि—
- शिक्षा सोच पैदा करे, सिर्फ डिग्री नहीं
- सत्ता में वही आए जो समाज को समझता हो
- केवल जाति के नाम पर नेतृत्व खड़ा करना समाज के साथ धोखा है
आज जब शिक्षा रोजगार से कटती जा रही है और राजनीति योग्यता से दूर होती दिख रही है, तो लोहिया का विश्लेषण और गहरा लगता है।
हुकुमदेव नारायण यादव की टिप्पणी: “समस्या बदली नहीं, सिर्फ समय बदला”
पूर्व सांसद हुकुमदेव नारायण यादव का कहना है कि
“डॉ. लोहिया जिन समस्याओं की बात कर रहे थे, वे आज भी मौजूद हैं। रूप बदला है, जड़ वही है।”
उनका मानना है कि आज की युवा पीढ़ी, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज को लोहिया के विचारों पर गंभीर राष्ट्रीय बहस करनी चाहिए।
आज के भारत के लिए लोहिया का संदेश क्या है?
- जाति का इस्तेमाल सत्ता के लिए नहीं, समाधान के लिए हो
- आक्रोश नहीं, संगठन खड़ा किया जाए
- राजनीति भावनाओं से नहीं, विचारों से चले
- सामाजिक न्याय भाषण नहीं, संरचना बने
लोहिया का समाजवाद न नफरत सिखाता है, न टकराव —
वह चेतना, संवाद और संतुलन की बात करता है।
✍️ Bihar Baithak Editorial Note
डॉ. राममनोहर लोहिया किसी एक राज्य या भूगोल तक सीमित विचारक नहीं थे।
वे भारत की आत्मा, समाज की संरचना और लोकतंत्र की कमजोर नसों को पहचानने वाले चिंतक थे।
1962 में दी गई उनकी चेतावनी आज भी उतनी ही जीवित है — क्योंकि जिन सवालों की उन्होंने बात की थी,
उन पर हमने बहस की जगह सुविधा चुनी, और समाधान की जगह सत्ता।
आज जब वही समस्याएँ नए रूप में हमारे सामने खड़ी हैं,
तो सवाल यह नहीं है कि लोहिया गलत थे —
सवाल यह है कि हमने उनके विचारों को सुना क्यों नहीं, समझा क्यों नहीं, और अपनाया क्यों नहीं।
Bihar Baithak मानता है कि लोहिया को याद करना श्रद्धांजलि नहीं,
बल्कि उनके विचारों पर खुली, ईमानदार और राष्ट्रीय बहस शुरू करना ही सच्चा सम्मान है।
